जकात और मेरा समाज,मूस्लमान में जकात ,कूरान क्या कहता है जकात कै बारे में

देश में 33 फीसदी मुसलमानों को ही रोजगार मिला हुआ है शहरी इलाकों में हर 10 में से 3 मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे मुस्लिस समुदाय में सबसे ज्यादा 3 फीसदी बाल मजदूर देश में हर साल करीब 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की जकात निकलती है जकात की बड़ी रकम माफिया हड़प लेते हैं जकात सही लोगों तक पहुंचाना जकात देने वालों की जिम्मेदारी जकात के मकसद और तरीके का कुरआन में साफ जिक्र हर 4 में से 1 मुसलमान गरीब नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान गरीब है. देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं. उनकी स्थिति दलितों और आदिवासियों के मुकाबले थोड़ा बेहतर है. नेशनल काउंसिल फॉर अप्‍लायड इकोनॉमिक रिसर्च के अध्ययन के मुताबिक, शहरी इलाकों में हर 10 में से 3 मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे हैं. उनकी औसत मासिक आमदनी 550 रुपये है. ग्रामीण इलाकों में हालात और भी बुरे हैं. हर पांचवां मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे औसतन 338 रुपये मासिक आमदनी पर गुजर बसर कर रहा है. देश की आबादी में छोटी आबादी वाला सिख जहां 53 रुपये रोज खर्च करता है, वहीं मुसलमान महज 32.7 रुपये ही खर्च कर पाता है. राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफिस के मुताबिक, 2009-10 में मुस्लिम समुदाय का प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 980 रुपये था, जबकि सिख समुदाय का सबसे अधिक 1659 रुपये था. बाकी धार्मिक समुदायों का भी इसी के आसपास रहा. ये रिपोर्ट बताती है कि देश में मुस्लिम समुदाय गरीबी और आर्थिक तंगी के बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है. अब हम बात करते हैं मुसलमान खुद अपने लिए क्या कर रहे हैं. मुस्लिम समाज(विशेषकर मोयला समाज) में हर साल अल्लाह के नाम पर दिए जाने वाले हजारों करोड़ रुपये का दान निकलता है. अगर समाज में गरीबी जस की तस बनी हुई है, तो सवाल पैसा होता है कि अमीर मुसलमानों की तिजोरियों से जकात, खैरात, फितरे और सदके के नाम पर निकलने वाला हजारों करोंड़ रुपये का दान कहां जा रहा है? ये पैसा मुस्लिम समाज को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से मजबूत बनाने के लिए क्यों इस्तेमाल नहीं हो पा रहा? नसीर खान j मुताबिक, देशभर में हर साल करीब 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की जकात निकलती है. लेकिन जकात की बड़ी रकम गरीब मुसलमानों तक पहुंचने की बजाय जकात माफियाओं के पेट में चली जाती है. जकात निकालने वाले अमीर मुसलमान खुश होते हैं कि उन्होंने ऐसा करके अपना फर्ज पूरा कर दिया. लेकिन हकीकत ये है कि देशभर में मदरसों से जुड़े लोग यतीम बच्चों के नाम जकात इकट्ठा करके ले जाते हैं. बाद में यही पैसे यतीम बच्चों से अपने नाम कराकर उसे अपनी निजी संपत्ति में जोड़ लेते हैं. यहां ये जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर जकात है क्या और इसका मकसद क्या है. कुरआन मुसलमानों को समाज के कमजोर तबकों की मदद का आदेश देता है. सूराः अल-बकर की आयत नं. 177 में कहा गया है, '‘नेकी यह नहीं है कि तुम अपने मुंह पूरब या पश्चिम की तरफ कर लो. बल्कि नेकी तो यह है कि ईमान लाओ अल्लाह पर और कयामत के दिन पर और फरिश्तों पर, किताबों पर और पैगंबरों पर. अपने कमाए हुए धन से स्वाभाविक मोह होते हुए भी उसमें से अल्लाह के प्रेम में, रिश्तेदारों, अनाथों, मुहताजों और मुसाफिरों को और मांगने वालों को दो और गर्दन छुड़ाने में खर्च करो. नमाज स्थापित करो और जकात दो. जब कोई वादा करो, तो पूरा करो. मुश्किल समय, कष्ट, विपत्ति और युद्ध के समय में सब्र करें. यही लोग हैं, जो सच्चे निकले और यही लोग डर रखने वाले हैं.’’ यहां गर्दन छुड़ाने से तात्‍पर्य लोगों को गुलामी से आजाद कराने और कर्ज में डूबे हुए ऐसे लोगों को कर्ज चुकाने में मदद करने से है, जो अपनी सीमित आमदनी में कर्ज चुका पाने में सक्षम नहीं हैं. कुरआन में कई और भी जगहों पर ऐसी नसीहतें दी गई हैं. इसका मकसद समाज में अमीरी-गरीबी के फर्क को मिटाना है. Naseer khan j
कुरआन में जिक्र, 8 तरह के लोगों को दी जा सकती है जकात - अपने माल का ढाई फीसद देना होगा जकात जकात हर साहबे हैसियत मुसलमान पर फर्ज है। साहबे हैसियत वह है जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या फिर बावन तोला चांदी हो या इसकी कीमत के बराबर कैश हो और इसे रखे हुए उसे एक साल गुजर गया हो। ऐसे मुसलमान को जकात निकालना जरूरी है। उसे अपने माल का ढाई फीसद बतौर जकात निकालकर गरीब और मिस्कीनों में देना होगा। दीनी मामलों के जानकार मोहम्मद शहाबुद्दीन सिद्दीकी ने बताया कि यह गरीबों का हक है और इसे निकालना जरूरी है. ताकि न मांगना पड़े अपना हक ऐसा अक्सर देखा गया है कि गरीब और बेसहारा लोगों को घर- घर जाकर या मस्जिदों के बाहर खड़े होकर अपना हक मांगना पड़ता है। ऐसे लोगों को लोग चंद पैसे देकर चलता कर देते हैं और ऐसे लोगों को जकात की रकम दे देते हैं जो सही मायने में उसके हकदार नहीं हैं। असल में जकात के पैसों पर पहला हक इन्हीं लोगों का है। उन्होंने बताया कि लोग इनको मस्जिदों के बाहर भले ही कुछ पैसा दे दें, लेकिन जकात के नाम से जो पैसा निकलता है, उसमें से इनको हिस्सा नहीं मिलता है। जकात देने वाले की जिम्मेदारी जहां तक मिस्कीनों की बात है, तो इनको इनका हिस्सा बिल्कुल ही नहीं मिल पाता। ये लोग दूसरों के सामने अपनी जरूरतों को बयान करने से परहेज करते हैं। जकात के हकदारों में मिस्कीनों को शामिल करने का मतलब ये हुआ कि गरीबों का ये काम नहीं है कि वो जकात मांगने जाएं, तभी उनको हिस्सा मिले बल्कि इसकी जिम्मेदारी भी जकात देने वाली की ही है कि वह खुद यह देखे के इसका असल हकदार कौन है और उसे उसका हक मिल पा रहा है या नहीं। जकात से दी जा सकती है जमानत मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया के मोहम्मद आजम ने बताया कि पहले लोग गुलामों को आजाद कराकर भी जकात अदा करते थे। इसमें मालिकों से सौदा करके गुलाम को खरीदकर आजाद कर दिया जाता था। आज हमारे समाज में गुलाम नहीं हैं, लेकिन बहुत से लोग ऐसे है, जो किसी वजह से जेलों में बन्द हैं, लेकिन अपनी गरीबी की वजह से जमानत की रकम नहीं जमा कर पाने से अब तक आजाद नहीं हो सके हैं। उनकी जमानत देने के लिए जकात के पैसों से मदद की जा सकती है, ताकि उन्हें गुलामों जैसी जिंदगी से रिहाई मिल सके। मुसाफिरों को भी दे सकते हैं जकात जकात का पैसे में कर्जदारों और मुसाफिरों का भी हिस्सा है, लेकिन जब फकीरों और मिस्कीनों जैसे बेहद जरूरतमंदों तक इनका हिस्सा नहीं पहुंच सकता, तो इस पैसे से कर्ज अदायगी के लिए सोचना बेकार है। वहीं अगर सफर के दौरान किसी का पैसा खो जाए और उसके पास घर वापस लौटने के लिए पैसा न हो तो उसकी मदद जकात के पैसों से की जा सकती है। इन्हें दे सकते हैं जकात फकीर, मिस्कीन, कर्मचारी (ऐसे लोग जो जकात की रकम इकट्ठा करने के लिए लगाए गए हों), तालीफे कल्ब, किसी को छुड़ाने में, कर्जदार, अल्लाह की राह में, परेशान मुसाफिर को अखिल भारतीय मोयला समाज सेवा समिति

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